इस पुस्तक की पहली चीज जिसने मुझे आकर्षित किया, वो था इसमें प्रयोग किया गया हिंदी का "फॉन्ट" और उस फॉन्ट का "साइज" भी। मुझे नहीं मालूम कि इसमें किसी खास फॉन्ट का प्रयोग किया गया था या ये बस हिंदी के अक्षरों की नैसर्गिक सुंदरता थी जो मैं एक अंतराल के बाद अनुभव कर रहा था।
जब मैंने इसकी भूमिका पढ़ी, जो कि मुश्किल से एक पृष्ठ की थी, मैं फिर से भाषा और साहित्य के सुन्दर समंदर में गोते लगाने लगा। हर वाक्य जैसे मोतियों से पिरोयी हुई माला। और उनका भावार्थ गूढ़ और सुंदरता से भरा हुआ। ऐसे सुन्दर हिंदी साहित्य को पढ़ कर मन उल्लास से भर उठा।
फिर मैंने इसकी पहली कहानी पढ़ी, जो कि पुस्तक के शीर्षक वाली कहानी ही थी। लेखिका की "ट्रेडमार्क स्टाइल" हर वाक्य, हर अनुच्छेद में साफ झलक रही थी। इनके लेखन को पढ़ना इतना आनंददायी है कि शब्दों में वर्णन कठिन है। इन पृष्ठों में पाठक प्रत्याशा, रोमांच, भय, संतोष, ऐसे अलग-अलग भाव महसूस करता है और एक रोमांचकारी यात्रा का अनुभव लेता है। "एक चुटकी उदासी" एक बेहद परिपक्व कहानी बन आयी है जो लेखन की अप्रतिम दक्षता और गहराई को दिखलाता है। इस कहानी की जितनी प्रशंशा की जाए, कम है। "वह मोहल्ले की उस तरह की फुसफुसाहट थी जो बातों में किसी कागज की नाव की तरह कुछ देर तैरती तो थी, लेकिन गहराई में कभी नहीं उतरती।" एक और, "और उसके सामने बैठा रोहन ऐसा लग रहा था जैसे कोई पन्ना आधा पलट रह गया हो।"
एक आश्चर्य की बात ये थी कि पहली कहानी पढ़ने के बाद मन ऐसा तृप्त हुआ कि आगे दूसरी किसी कहानी को पढ़ने का मन बनाना मुश्किल था। संग्रह की दूसरी कहानी "साँझ के देवता और.." गरीब बच्चों के जीवन पर आधारित कहानी थी और दिलचस्प थी। "मध्य रात्रि के पथिक" पढ़कर डर लगा क्योंकि समाचार की दिल्ली हिंसा की घटनाओं के लिए भी कुख्यात है। "दास्तानगोई" एक और कहानी थी जिसका सार मुझे पसंद आया। अंत की कुछ कहानियाँ अभी भी पढ़ना शेष हैं।
कुल मिलाकर मैं ये कहना चाहूँगा कि "एक चुटकी उदासी" कहानी संग्रह साहित्य और पढ़ने में जो नैसर्गिक सुंदरता है, उसकी मिसाल है। इसकी कहानियाँ मोड़ों और उलटफेर, या लोकप्रियता के लिए समझौता करती हुई नहीं, बल्कि लेखन और अवलोकन की नैसर्गिक सुंदरता के लिए जानी जाएँगी।
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- राहुल











































